
GOVERNMENT STRUCTURE OF UNION GOVERNMENT .
LEGISLATURE (विधायिका)

Legislature एक Law Making Body होती है, जो विधायिका का कार्य नए कानून बनाना और पुराने कानून में बदलाव करना यह Legislature का काम होता है।
विधायिका के दो भाग होते हैं उसमें से एक होता है केंद्र सरकार जो के पूरे देश के लिए लागू होता है और दूसरा होता है राज्य सरकार जो के हर एक राज्य के लिए लागू होता है।
CENTRAL GOVERNMENT (केंद्र सरकार)
अगर देश के लिए कोई भी कानून बनाना होता है तो वह केंद्र सरकार बनाती है।
देश के लिए जहां पर कानून बनाए जाते हैं उस जगह को हम संसद ( Parliment) कहते हैं।
संसद में भी कानून बनाने के लिए दो हाउसेस होते हैं।
जिसमें से एक लोकसभा (Lower House) होता है और दूसरा राज्यसभा (Upper House) होता है।

लोकसभा को हाउस आफ पीपल और राज्यसभा को काउंसिल ऑफ स्टेट कहा जाता है।
STATE GOVERNMENT (राज्य सरकार)
राज्य सरकार जब कानून बनाती है तब वह कानून पूरे राज्य के लिए लागू होता है।
राज्य सरकार के लिए यहां पर कानून बनते हैं उसे भी विधानमंडल / विधायिका ( LEGISLATURE ) कहते हैं।
विधानमंडल में भी कानून बनाने के लिए हाउसेस होते हैं जिसमें से एक होता है विधानसभा (legislative assembly)।
विधानसभा हर एक राज्य में होता है।
दूसरा होता है विधान परिषद (legislative council) ।
जरूरी नहीं है कि विधान परिषद हर जगह पर हो।


जैसे कि हमने ऊपर देखा Legislature एक Law Making Body होती है, जो Legislature (विधायिका) का कार्य नए कानून बनाना और पुराने कानून में बदलाव करना यह Legislature का काम होता है।
सेंट्रल गवर्नमेंट की तरह ही स्टेट गवर्नमेंट में भी विधायिका (legislature) होती है। और उसे विधाईका के भी दो अंग होते हैं जिनको विधानसभा (legislative assembly) और दूसरे को विधानपरिषद (legislative council) कहा जाता है।
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विधानपरिषद (legislative council)
विधान परिषद ऊपरी सदन होता है। विधान परिषद के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं और यह राज्यसभा की तरह ही स्थाई सदन होता है।
जिस प्रकार संसद के दो सदन होते हैं उसी प्रकार भारतीय संविधान के आर्टिकल नंबर 169 के अनुसार स्टेट में विधानसभा के अलावा एक विधान परिषद भी हो सकती है जिसे द्विसदनीय प्रणाली कहा जाता है।
विधान परिषद कुछ ही राज्यों में मौजूद है जैसे की :-
- महाराष्ट्र
- कर्नाटक
- उत्तर प्रदेश
- आंध्र प्रदेश
- बिहार
- तेलंगाना
विधान परिषद का सदस्य होने के लिए
विधान परिषद का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है ।
विधान परिषद एक स्थाई सदन है और कभी भी भंग नहीं होती है।
जिस क्षेत्र से चुनाव लड़ा है उसे सूची में उसका नाम होना आवश्यक है।
विधान परिषद के सदस्य की न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए।
विधान परिषद का सदस्य होने के लिए वह मानसिक रूप से समर्थ होना चाहिए।
POWER OF LEGISLATIVE COUNCIL
विधान परिषद कभी भी भंग नहीं होती है ।
संविधान में लिखा गया है कि प्रत्येक राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की संख्या विधान परिषद के सदस्यों की संख्या से 1/3 से अधिक ना हो।
साथ-साथ यह भी कहा गया है कि किसी भी हाल में विधान परिषद के सदस्यों की संख्या 40 से काम भी नहीं होनी चाहिए।
हालांकी जम्मू और कश्मीर को इस विषय में अपवाद रखा गया है।
उदाहरण:
- उत्तर प्रदेश – 100 सदस्य
- महाराष्ट्र – 78 सदस्य
- बिहार – 75 सदस्य
विधानसभा (legislative assembly)
विधानसभा राज्य विधायिका का निचला सदन होते जिसे जनता सीधे खुद वोट देकर चुनती है और इसमें अधिक विधाई शक्तियां मौजूद होती है।
इसमें जरूरी नहीं होता कि विधानसभा हर एक राज्य में मौजूद हो ।
कुछ राज्यों में विधानसभा केवल एक होती है जिसको एकसदनी (Unicameral) विधान सभा कहा जाता है जबकि कुछ राज्यों में दो सदनी होती है जिसको द्विसदनी (Bicameral) विधानसभा कहा जाता है।
लोकसभा और राज्यसभा की तरह ही यह राज्य स्तर पर विधायक कार्य करने वाली संस्था होती है।
विधानसभा सदस्य
विधानसभा में चुने जाने वाले सदस्य 25 साल के होने चाहिए ।
विधानसभा का कार्यकाल 5 साल का होता है।
विधानसभा में अध्यक्ष द्वारा संचालित कार्यवाही की जाती है।
विधानसभा में चुने जाने वाले सदस्य भारत के नागरिक होने चाहिए ।
केंद्र सरकार या राज्य सरकार के किसी लाभ के पद पर नहीं होना चाहिए।
विधानसभा के बिना किसी भी राज्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती है क्योंकि विधानसभा के जो सदस्य होते हैं वह आम जनता ने वोट देकर चुने हुए होते हैं जिसके थ्रू आम जनता अपनी प्रॉब्लम्स सरकार के आगे बता सकती है।
वास्तव में संसद को एक बहुत बड़ा अधिकार है कि वह किसी भी राज्य के विधान परिषद को भंग कर सकती है और जिस राज्य में विधान परिषद नहीं है वहां पर विधान परिषद की स्थापना भी कर सकती है।
- संविधान में राज्य के विधानसभा के लिए सदस्य की अधिक से अधिकतम संख्या 500 और कम से कम संख्या 60 तक हो सकती है।
- लेकिन भारत में ऐसे कुछ राज्य भी है जिसमें विधानसभा की कम से कम संख्या 60 से भी काम है जैसे कि गोवा है सिक्किम, पांडिचेरी, मिजोरम है।
- इन कुछ राज्यों में विधानसभा में सदस्यों की संख्या 60 से भी काम है।
- किसी क्षेत्र को विधानसभा कहलन के लिए आवश्यक है कि उसे क्षेत्रफल की आबादी कम से कम 75000 होनी चाहिए।
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विधान सभा के कार्य और अधिकार
- विधानसभा के बिना किसी भी राज्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती है क्योंकि विधानसभा के जो सदस्य होते हैं वह आम जनता ने वोट देकर चुने हुए होते हैं जिसके थ्रू आम जनता अपनी प्रॉब्लम्स सरकार के आगे बता सकती है।
- वास्तव में संसद को एक बहुत बड़ा अधिकार है कि वह किसी भी राज्य के विधान परिषद को भंग कर सकती है और जिस राज्य में विधान परिषद नहीं है वहां पर विधान परिषद की स्थापना भी कर सकती है।
- संविधान में राज्य के विधानसभा के लिए सदस्य की अधिक से अधिकतम संख्या 500 और कम से कम संख्या 60 तक हो सकती है।
- लेकिन भारत में ऐसे कुछ राज्य भी है जिसमें विधानसभा की कम से कम संख्या 60 से भी काम है जैसे कि गोवा है सिक्किम, पांडिचेरी, मिजोरम है। इन कुछ राज्यों में विधानसभा में सदस्यों की संख्या 60 से भी काम है।
- राज्य की कोई भी प्रॉब्लम हो वह विधान परिषद और विधानसभा दोनों में में भी पेश की जा सकती है लेकिन अगर धन विधेयक के बारे में कोई बिल हो तो वह केवल विधानसभा में ही पेश किया जा सकता है।
- द्विसदनी प्रणाली वाले राज्य में विधानसभा से धन विधेयक पास होने के बाद उसे विधान परिषद के पास भेजा जाता है।
जो धन विधेयक विधान परिषद में जाता है उसे अधिकतम 14 दिनों के लिए ही रोक कर रखा जा सकता है उसके बाद उसे पास करना होता है।
POWERS OF LEGISLAVE ASSEMBLY (विधानसभा)
- विधानसभा के सदस्य अलग-अलग तरीके से सरकार पर नियंत्रण रखते हैं।
- विधानसभा के सदस्यों को सरकार को प्रश्न पूछने का अधिकार होता है।
- राज्य के प्रशासन पर विधानसभा का पूर्ण नियंत्रण होता है।
- विधानसभा के सदस्य सरकार के किसी भी कामकाज पर आलोचना व्यक्त कर सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर विधानसभा के सदस्य सरकार के विरुद्ध अविश्वास दखल पत्र भी प्रस्ताव बढ़ा सकते हैं।
- अगर विश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है तो सरकार को त्यागपत्र भी देना पड़ता है।
- यह विश्वास पत्र प्रस्ताव सरकार के विरुद्ध केवल विधानसभा में ही लाया जा सकता है।
- मख्यमंत्री और राज्य मंत्री सामूहिक रूप से विधानसभा के लिए जिम्मेदार होते हैं।
FINANCIAL POWER OF LEGISLAVE ASSEMBLY
राज्य की किसी भी तरह की वित्तीय शक्ति (FINANCIAL POWER) हो उसे पर सिर्फ विधानसभा का ही पूर्ण नियंत्रण होता है।
वित्तीय विधेयक केवल सिर्फ विधानसभा में ही पेश किया जाता है ।
इसके अलावा राज्य का वार्षिक बजट भी विधानसभा में ही पारित किया जाता है।
विधानसभा की परमिशन के बिना सरकार भी कोई “कर” नहीं लगा सकती और ना हीं यह धन का खर्च कर सकती है।
धन विधेयक के अलावा साधारण विधेयकों में भी विधानसभा का ही मत मान्य होता है।
विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों को राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेने का सबसे बड़ा अधिकार प्राप्त है।
विधानसभा के सदस्यों को अधिक अधिकार दिए गए हैं।

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