छत्रपति Sambhaji Maharaj, छत्रपति शिवाजी महाराज के वीर पुत्र और मराठा साम्राज्य के दूसरे छत्रपति थे।

उनका जीवन शौर्य, त्याग, पराक्रम और धर्मनिष्ठा का श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है।
11 मार्च का दिन महाराष्ट्र में उनके बलिदान दिवस के रूप में अत्यंत श्रद्धा और भावनाओं के साथ स्मरण किया जाता है।
संभाजी महाराज ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में स्वराज्य की रक्षा की और अपने अंतिम श्वास तक मराठा साम्राज्य को बचाने के लिए संघर्ष किया। (Sambhaji Maharaj)
उनका जीवन केवल एक राजा का जीवन नहीं था, बल्कि साहस, ज्ञान और आत्मत्याग का महान उदाहरण था।
संभाजी महाराज : मराठा साम्राज्य के गौरव
Sambhaji Maharaj का जन्म 14 मई 1657 को हुआ। उनके पिता महान योद्धा और स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज थे और उनकी माता सईबाई थीं।
माना जाता है कि संभाजी महाराज का जन्म पुरंदर किला में हुआ था। बचपन से ही उन पर स्वराज्य के संस्कारों का गहरा प्रभाव पड़ा।
उनकी माता का निधन तब हो गया था जब वे बहुत छोटे थे, इसलिए उनका पालन-पोषण मुख्य रूप से उनकी दादी राजमाता जिजाऊ के मार्गदर्शन में हुआ। जिजाऊ ने उन्हें धर्म, संस्कार, शौर्य और कर्तव्य का महत्व सिखाया।

संभाजी महाराज अत्यंत बुद्धिमान और अध्ययनशील थे। उन्होंने कम उम्र में ही कई भाषाएँ सीख ली थीं।
मराठी, संस्कृत, फारसी और हिंदी जैसी भाषाओं पर उनका अच्छा अधिकार था। (Sambhaji Maharaj)
वे केवल एक योद्धा ही नहीं बल्कि विद्वान भी थे। माना जाता है कि उन्होंने “बुधभूषण” नाम का एक संस्कृत ग्रंथ लिखा था।
उन्हें साहित्य, राजनीति और युद्धनीति का भी गहरा ज्ञान था। इसलिए वे केवल तलवार से ही नहीं बल्कि अपनी बुद्धि से भी राज्य का संचालन करने वाले राजा थे।
बचपन से ही संभाजी महाराज ने युद्धकला का प्रशिक्षण प्राप्त किया। घुड़सवारी, तलवारबाजी, धनुर्विद्या और युद्धनीति में वे अत्यंत निपुण थे।

उन्होंने कई युद्धों में अपने पिता के साथ भाग लिया, जिससे उन्हें कम उम्र से ही युद्ध का अनुभव प्राप्त हो गया। वे साहसी और पराक्रमी थे, इसलिए सैनिकों के बीच भी उनका बहुत सम्मान था।
संभाजी महाराज का राज्यारोहण और स्वराज्य का नेतृत्व
1680 में छत्रपति शिवाजी महाराज का निधन हो गया। इसके बाद स्वराज्य पर बड़ा संकट आया।
अनेक आंतरिक राजनीति और कठिनाइयों के बावजूद संभाजी महाराज ने राज्य की भागदौड़ अपने हाथ में ली और मराठा साम्राज्य के दूसरे छत्रपति बने।

उन्होंने राज्य का संचालन अत्यंत साहस और कठोर निर्णयों के साथ किया। उस समय मुगल सम्राट औरंगजेब दक्षिण में आकर स्वराज्य को समाप्त करने का प्रयास कर रहा था। औरंगजेब ने मराठा साम्राज्य को नष्ट करने के लिए विशाल सेना भेजी थी।
लेकिन संभाजी महाराज ने मुगलों की विशाल सेना का डटकर सामना किया। उन्होंने कई युद्धों में मुगलों को पराजित किया और स्वराज्य की रक्षा की। उनकी युद्धनीति तेज और चतुर थी। Sambhaji Maharaj
अचानक हमले, युद्ध और साहसी अभियानों के कारण शत्रु भयभीत हो जाते थे। इसी कारण औरंगजेब के लिए मराठों को पूरी तरह पराजित करना बहुत कठिन हो गया।
Sambhaji Maharaj ने केवल मुगलों से ही नहीं बल्कि पुर्तगालियों और सिद्दियों से भी संघर्ष किया। उन्होंने गोवा के पुर्तगालियों के विरुद्ध अभियान चलाए और मराठा साम्राज्य का प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया।

उनके शासनकाल में मराठा साम्राज्य को कई कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
संभाजी महाराज का व्यक्तित्व अत्यंत कठोर और निर्भीक था। वे अन्याय को सहन नहीं करते थे। राज्य में अनुशासन बनाए रखने के लिए उन्होंने कई कठोर निर्णय लिए।
इसी कारण कुछ लोग उनकी आलोचना भी करते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य हमेशा स्वराज्य की रक्षा करना ही था। उस समय स्वराज्य को बचाए रखना ही सबसे बड़ा कार्य था और उन्होंने इसे अत्यंत साहस के साथ किया।
संभाजी महाराज का अटूट साहस और यातनाएँ
1689 में संभाजी महाराज संगमेश्वर में थे, तभी मुगलों ने अचानक हमला कर दिया। उस समय उनके साथ उनके विश्वासपात्र मित्र और कवि कलश भी थे। (Sambhaji Maharaj)

मुगल सेना ने उन्हें पकड़ लिया और औरंगजेब के सामने प्रस्तुत किया। औरंगजेब ने संभाजी महाराज को इस्लाम धर्म स्वीकार करने का प्रस्ताव दिया। यदि वे धर्म परिवर्तन कर लेते तो उन्हें जीवनदान दिया जाता।
लेकिन संभाजी महाराज ने धर्म परिवर्तन करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया।
उन्होंने अत्यंत कठोर यातनाएँ सहन कीं, लेकिन अपने धर्म और स्वाभिमान को नहीं छोड़ा।
लगभग चालीस दिनों तक उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी गईं, फिर भी उन्होंने शत्रु के सामने सिर नहीं झुकाया।
11 मार्च: इतिहास का वह काला दिन
अंततः 11 मार्च 1689 को औरंगजेब के आदेश से उनकी अत्यंत क्रूरता से हत्या कर दी गई। इतिहास में यह दिन उनके बलिदान दिवस के रूप में जाना जाता है।

संभाजी महाराज का बलिदान भारतीय इतिहास के सबसे महान त्यागों में से एक माना जाता है। उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन धर्म, स्वाभिमान और स्वराज्य की प्रतिष्ठा को बनाए रखा।
उनके निधन के बाद भी मराठा साम्राज्य का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। बल्कि उनके बलिदान से मराठा सैनिकों को नई प्रेरणा मिली।
उनके बलिदान के बाद भी मराठा साम्राज्य ने संघर्ष जारी रखा और अंततः औरंगजेब को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। संभाजी महाराज की प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनी।
उनका पराक्रम और त्याग आज भी महाराष्ट्र के लोगों के हृदय में जीवित है। (Sambhaji Maharaj)
धर्म और स्वाभिमान के आगे कभी नहीं झुके संभाजी महाराज
संभाजी महाराज का जीवन हमें साहस, स्वाभिमान और कर्तव्यनिष्ठा की शिक्षा देता है। कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए, यह उनके जीवन से स्पष्ट होता है।
उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा नेता वही होता है जो संकटों में भी अपने लोगों और अपने मूल्यों के लिए खड़ा रहता है।
आज महाराष्ट्र और पूरे भारत में संभाजी महाराज का बलिदान दिवस अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग उनकी स्मृति को नमन करते हैं और उनके कार्यों को याद करते हैं।
कई स्थानों पर व्याख्यान, कार्यक्रम और श्रद्धांजलि सभाएँ आयोजित की जाती हैं। लोग उनके पराक्रम की गाथाएँ सुनाते हैं और नई पीढ़ी को उनके इतिहास से परिचित कराते हैं।
धर्मवीर संभाजी महाराज: वह बलिदान जो सदियों तक याद रहेगा
Sambhaji Maharaj का इतिहास केवल अतीत की घटना नहीं है, बल्कि वह प्रेरणा देने वाला संदेश है।
स्वाभिमान, धर्मनिष्ठा और देशभक्ति का महत्व उनके जीवन से समझ में आता है। इसलिए महाराष्ट्र में उन्हें अत्यंत सम्मान के साथ “धर्मवीर संभाजी महाराज” कहा जाता है।

उनके जीवन का संघर्ष, त्याग और पराक्रम उन्हें भारतीय इतिहास के महान योद्धाओं में स्थान दिलाता है। उन्होंने अपने पिता द्वारा स्थापित स्वराज्य की रक्षा के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया। उनके बलिदान के कारण स्वराज्य की ज्योति कभी बुझ नहीं पाई।
आज भी जब स्वाभिमान, साहस और देशभक्ति की बात होती है, तब छत्रपति संभाजी महाराज का नाम बड़े गर्व से लिया जाता है।
उनका जीवन और बलिदान आने वाली अनेक पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। उनके कार्यों से मराठा साम्राज्य की परंपरा और भी मजबूत हुई और स्वराज्य का इतिहास और अधिक गौरवशाली बन गया।
इसीलिए छत्रपति संभाजी महाराज का नाम इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। उनके त्याग और शौर्य के कारण वे आज भी महाराष्ट्र और भारत के इतिहास में अमर हैं।
________________________________________________________________Sambhaji Maharaj By Saraswati Phate

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