14 April
पहला धर्म: हिंदू
पहली जाति: महार
समाज में स्थिति: अछूत
डॉ. बाबासाहेब किसके दामाद थे?
पहली शादी (4 अप्रैल 1906)
रमाबाई भीमराव आंबेडकर

बाबासाहेब की उम्र: 15 साल
रमाबाई की उम्र: 9 साल थी।
रमाबाई जी दलित (महार) समाज से थींI
उन्होंने बाबासाहेब के संघर्ष के दिनों में बहुत साथ दिया
दूसरी शादी (15 अप्रैल 1948)
डॉ. सविता भीमराव आंबेडकर
डॉ. शारदा कबीर (विवाह पूर्व नाम)

वे पेशे से डॉक्टर थीं I
उनकी जाति: सारस्वत ब्राह्मण परिवार था।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कृष्णराव विनायक कबीर के दामाद थेI
डॉ. बाबासाहेब ने दूसरी शादी क्यों की
उनकी पहली पत्नी रमाबाई आंबेडकरका निधन 1935 में हो गया था।
उसके बाद बाबासाहेब की तबीयत लगातार खराब रहने लगी उन्हें diabetes, blood pressure और कमजोरी रहती थी।
इसी दौरान उनकी मुलाकात डॉ. शारदा कबीर से हुई, जो एक डॉक्टर थीं और उनका इलाज कर रही थीं।
शारदा जी ने उनकी सिर्फ डॉक्टर की तरह नहीं, बल्कि एक सच्चे साथी की तरह देखभाल की।
धीरे-धीरे दोनों के बीच सम्मान, विश्वास और अपनापन बढ़ा, और फिर 15 अप्रैल 1948 को नई दिल्ली में दोनों ने शादी कर ली।
यह शादी खास क्यों थी?
- बाबासाहेब की उम्र: 57 साल थी I
- सविता जी की उम्र: 39 साल थी I
- यह एक inter-caste marriage थी I
- उस समय समाज में इसकी बहुत चर्चा हुई I
- लेकिन सविता जी ने आखिरी सांस तक उनका साथ निभाया I
खुद बाबासाहेब ने लिखा था कि
सविता जी ने मेरी जिंदगी 8–10 साल बढ़ा दी।
आखिरी किताब
उनकी आखिरी किताब थी The Buddha and His Dhamma।
यह किताब उन्होंने 1956 में अपनी मृत्यु से ठीक पहले पूरी की, और यह 1957 में उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई।
डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का जीवन संघर्ष, जिद्द और परिवर्तन की प्रेरणादायक कहानी है।
एक तरफ बाबासाहेब अपनी जिंदगी की सबसे आध्यात्मिक और क्रांतिकारी किताब लिख रहे थे,
और दूसरी तरफ डॉ. सविता आंबेडकर उनकी सेहत संभालकर उन्हें वह किताब पूरी करने की ताकत दे रही थीं।
इसीलिए बहुत लोग कहते हैं
The Buddha and His Dhamma सिर्फ बाबासाहेब की आखिरी किताब नहीं, बल्कि सविता जी के साथ उनके जीवन के अंतिम संघर्ष की निशानी है।
अपने माता-पिता की 14 वीं संतान थे
डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का जन्म 14 April 1891 को मध्य प्रदेश के महू में हुआ था।
बहुत कम लोगों को पता है कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अपने माता-पिता की 14 वीं और अंतिम संतान थे।
इतनी बड़ी पारिवारिक परिस्थितियों में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपने जीवन को जिस ऊंचाई तक पहुंचाया, वह अपने आप में असाधारण है।
वे बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान थे, लेकिन उन्हें जाति व्यवस्था के कारण अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
स्कूल में उन्हें अलग बैठाया जाता था, यहाँ तक कि पानी पीने के लिए भी भेदभाव सहना पड़ता था।
इन अन्यायों का उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और आगे चलकर समाज परिवर्तन की दृढ़ प्रेरणा मिली।
जिस धर्म में इंसान को इंसान न माना जाए, उसमें सम्मान कैसे मिलेगा?
इसीलिए उन्होंने 1935 में ही कहा था:
I Was Born a Hindu, But I Will Not Die As a Hindu
शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार है, इस पर उनका अटूट विश्वास था। इसलिए उन्होंने कितनी भी बाधाएँ आईं, फिर भी शिक्षा नहीं छोड़ी।
उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की और आगे अमेरिका के Columbia University में जाकर उच्च शिक्षा पूरी की।
इसके बाद उन्होंने London School of Economics में भी अध्ययन कर अर्थशास्त्र और कानून के क्षेत्र में महारत हासिल की। उस समय इतना उच्च शिक्षित होना अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
भारत लौटने के बाद उन्होंने समाज के उपेक्षित और वंचित लोगों के लिए काम शुरू किया। उन्होंने “बहिष्कृत हितकारिणी सभा” की स्थापना कर शिक्षा, समानता और स्वाभिमान का प्रचार किया।
उन्होंने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिनमें Mahad Satyagraha विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इस आंदोलन के माध्यम से उन्होंने सभी लोगों को समान अधिकार से पानी उपयोग करने का अधिकार दिलाने का प्रयास किया।
संविधान का निर्माण
डॉ. आंबेडकर का सबसे बड़ा योगदान भारतीय संविधान का निर्माण है। वे संविधान सभा के प्रमुख शिल्पकार थे।
डॉ. आंबेडकर ने संविधान में सभी नागरिकों को समान अधिकार, न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व की गारंटी दी। उनकी दूरदृष्टि के कारण ही आज भारत एक लोकतांत्रिक और समानता पर आधारित देश के रूप में खड़ा है।

उन्होंने केवल सामाजिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक सुधारों पर भी विशेष जोर दिया।
महिलाओं के अधिकारों के लिए भी उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने महिलाओं को शिक्षा, समान वेतन और संपत्ति का अधिकार दिलाने के लिए प्रयास किए।
उनके अनुसार समाज की प्रगति महिलाओं की प्रगति के बिना संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने महिला सशक्तिकरण को विशेष महत्व दिया।
उन्होंने बौद्ध धर्म क्यों स्वीकार किया?
उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव 1956 में बौद्ध धर्म स्वीकार करना था। उन्होंने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाकर समानता, मानवता और शांति का संदेश दिया। यह निर्णय केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि सामाजिक क्रांति का प्रतीक भी था।
बाबासाहेब ने कई धर्मों का गहराई से अध्ययन किया—हिंदू, इस्लाम, ईसाई, सिख और बौद्ध। लंबे चिंतन के बाद उन्हें लगा कि बौद्ध धर्म सबसे अधिक वैज्ञानिक, तार्किक और मानवतावादी है।
उन्हें बुद्ध के तीन मूल संदेश सबसे ज्यादा प्रभावित करते थे
- समता (Equality)
- करुणा (Compassion)
- प्रज्ञा (Wisdom)

बौद्ध धर्म में जन्म के आधार पर ऊंच-नीच नहीं है। यही वह विचार था जो उनके सामाजिक संघर्ष से पूरी तरह मेल खाता था।
उनके लिए बौद्ध धर्म अपनाना सिर्फ आध्यात्मिक निर्णय नहीं, बल्कि self-respect movement था।
- बचपन से झेला,
- स्कूल में अलग बैठना
- पानी छूने की अनुमति नहीं
- सामाजिक बहिष्कार
- मंदिर प्रवेश पर रोक
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यही अनुभव आगे चलकर उनके समानता और सामाजिक न्याय के आंदोलन की सबसे बड़ी प्रेरणा बने।
इसीलिए उन्होंने 1935 में ही कहा थाI
बाद में 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया और लाखों अनुयायियों के साथ नया सामाजिक संदेश दिया समानता, मानवता और स्वाभिमान I
डॉ. आंबेडकर के विचार आज भी उतने ही प्रभावशाली और मार्गदर्शक हैं।
“शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो” उनका संदेश हर पीढ़ी को प्रेरणा देता है। उन्होंने जीवनभर अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया और समाज को समानता का मार्ग दिखाया।
आज उनके कार्यों से लाखों लोगों को नई दिशा मिली है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, मेहनत, आत्मविश्वास और शिक्षा के बल पर सफलता प्राप्त की जा सकती है।
इसलिए डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर केवल एक महान नेता ही नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक युगपुरुष हैं, जिनके विचार और कार्य सदैव जीवित रहेंगे।
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____________________________________________________________________________By Saraswati Phate

👍🏻
अतिशय उत्कृष्ट माहिती 👌👍
खूप छान लिहिले 👌🙏👍