राम नवमी की सही तारीख
उदयातिथि के आधार पर राम नवमी 27 मार्च को है, लेकिन मध्याह्नवापिनी मुहूर्त यानि नवमी तिथि में दोपहर का मुहूर्त 26 मार्च को प्राप्त हो रहा है।
पंचांग के अनुसार, राम नवमी के लिए चैत्र शुक्ल नवमी तिथि 26 मार्च दिन गुरुवार को 11 बजकर 48 मिनट से प्रारंभ होकर 27 मार्च दिन शुक्रवार को सुबह 10 बजकर 6 मिनट पर खत्म होगी।

रामनवमी : जब जब धरती पर अधर्म बढ़ेगा तब तब धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर स्वयं धरती पर अवतरित होंगे।
रामनवमी केवल राम जन्म नहीं है
बहुत प्राचीन समय की बात है, जब त्रेता युग चल रहा था और इस समय धरती पर अधर्म बहुत बढ़ गया था। धरती पर धर्म और अधर्म के बीच संतुलन बहुत बिगड़ चुका था।
धर्म धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा था और अधर्म अपने चरम सीमा पर था।

धर्म को बलवान रखने के लिए जंगलों में रहने वाले ऋषि मुनि, जो तपस्या और यज्ञ के माध्यम से संसार में शांति बनाए रखे थे।
लेकिन लगातार राक्षसों के अत्याचार से परेशान रहते थे और इस में सबसे शक्तिशाली और अहंकारी था लंका का राजा रावण ।
रावण कोई साधारण राक्षस नहीं था। शिव जी का परम भक्त, यह अत्यंत विद्वान और अपार शक्तियों का स्वामी था।
रावण ने अपार् वर्षों की तपस्या के बाद ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के बाद वरदान लिया की देवता, दानव या कोई भी दिव्य शक्ति उसे मार नहीं पाएगी ।
रावण की सबसे बड़ी गलती
इतना चतुर और विद्वान होने के बावजूद भी रावण ने मनुष्य और वानर को इस वरदान में शामिल नहीं किया।
क्योंकि उसे लगता था कि यह कमजोर है और यही उसकी सबसे बड़ी भूल निकली।
इस वरदान को पकड़ रावण अहंकार में आ गया और फिर उसने तीनों लोकों में आतंक फैलाना शुरू कर दिया क्योंकि रावण को यह घमंड था कि इन तीनों लोकों में उसे अपराजित करने वाला कोई भी नहीं है।
जिसकी वजह से उसने ऋषियों के यज्ञ भंग करने लगा और देवताओं को भी अपमानित करने लगा और इस धर्म से उसने श्रीलंका में अपना बहुत बड़ा साम्राज्य स्थापित कर दिया था।
धर्म की रक्षा करें…
जब बहुत अत्याचार होने लगा और देवी देवताओं को भी वह पैरों तले रखने लगा।
तब यह असहनीय अत्याचार को खत्म करने के लिए सभी देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और भगवान विष्णु को प्रार्थना की इस अधर्म का अंत करें ।
तब भगवान विष्णु ने स्वयं आश्वासन दिया कि वह मनुष्य रूप में जन्म लेकर रावण का वध करेंगे।
यह वह क्षण था जहां से राम कथा की शुरुआत होती है।
दिव्यता से मानवता तक…
तभी इस समय अयोध्या नगरी में राजा दशरथ नामक एक बहुत ही पराक्रमी और धर्मप्रिय राजा रहते थे।
वह लोगों की सेवा करते थे एक राजा होने के बावजूद भी उन्हें कोई भी घमंड नहीं था, लेकिन उनके जीवन में एक बहुत बड़ी कमी थी।
उनकी कोई भी संतान नहीं थी, संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने ऋषि वशिष्ठ की सलाह लेने पर पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया था I
यह यज्ञ पूर्ण होने के बाद अग्नि देव प्रकट हुए और अग्नि देव ने राजा दशरथ को एक दिव्य पायसम दिया जिसे खीर कहा जाता है। जिससे उनकी तीनों रानियां कौशल्या, कैकई और सुमित्रा में बांटा गया।
समय आने पर चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को दोपहर के समय अयोध्या में एक दिव्य घटना हुई जहां पर महारानी कौशल्या ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया जिनका नाम राम रखा गया इस समय पर सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया और कैकई ने भरत को।

स्वयं भगवान विष्णु का सातवां अवतार
यह कोई भी साधारण जन्म नहीं थे यह स्वयं भगवान के अवतार थे और इसमें जो श्री राम का जन्म था वह स्वयं भगवान विष्णु जी का सातवां अवतार था जो धरती पर धर्म की स्थापना के लिए लिया गया था।

श्री राम बचपन से ही असाधारण थे उनका स्वभाव शांत था, विनम्र था, अत्यंत करुणामय था लेकिन साथ ही वे अद्भुत पराक्रमी भी थे।
श्री राम गुरु वशिष्ट के शिष्य थे जिसकी वजह से उन्हें वेद शास्त्र और धनुर्विद्या की शिक्षा प्राप्त थी।
एक दिन श्री राम ऋषि विश्वामित्र के साथ वन में जाते हैं।
तब वहां पर वह देखते हैं कि ताड़का नामक राक्षसी और ऋषि मुनियों के यज्ञ को तहस-नहस कर रही थी तब भगवान श्री राम
ऋषि मुनियों की यज्ञ की रक्षा करते हैं।

जब संसार ने पहली बार किसी बालक को धर्म की रक्षा करते हुए देखा था,
उसी दिन संसार को पता चला था कि यह धर्म की रक्षा के लिए जन्म हुआ एक दिव्य पुरुष है।
प्रेम और कर्तव्य का पवित्र संबंध
कुछ सालों बाद एक दिन श्री राम और लक्ष्मण मिथिला पहुंचे जहां एक राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के लिए स्वयंवर आयोजित किया था।
राजा जनक ने अपनी पुत्री के स्वयंवर के लिए एक शर्त रखी थी, जो कि इस विशाल का धनुष को उठाकर उसे प्रत्यंचा चढ़ाएगा वही सीता का पति बनेगा।
कई सारे राजाओंने और योद्धाओं ने प्रयास किया लेकिन कोई भी सफल नहीं हुआ तब जी ने गुरु की आदत से वह धनुष उठाया और उसे प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कसा तब वह धनुष टूट गया।

और इसी प्रकार श्री राम और सीता का विवाह हुआ यह विवाह केवल दो ही व्यक्तियों के बीच में विवाह नहीं था बल्कि यह शक्ति का मिलन और धर्म की रक्षा का मिलन था।
अयोध्या का उत्सव, वनवास में बदल गया
समय बीतता गया और एक दिन ऐसा आया कि राजा दशरथ ने श्री राम को अयोध्या का राजा बनाने का निर्णय लिया उसे समय अयोध्या में पूरे उत्सव का माहौल था लेकिन तभी एक ऐसा मोड़ आया जिसने पूरी कहानी ही बदल दी।
कैकई की दासी मंत्र आने कैकई को भड़काकर राजा दशरथ से दो वरदान मांगे भारत को राजा बनना और श्री राम को 14 वर्षों के लिए वनवास देना।
कल राजा बनने के लिए जो अयोध्या में उत्सव और माहौल का वातावरण था वह श्री राम जी के वनवास में तब्दील हो गया और

उस समय श्री राम ने बिना किसी विरोध के अपने पिता की आज्ञा को स्वीकार कर लिया।
आज्ञाकारिता, त्याग और मर्यादा का सर्वोच्च उदाहरण बन गए।
जिस राजा ने अपनी बेटी को एक मर्यादा पुरुषोत्तम के साथ विवाह के बंधन में बांध दिया था वह श्री राम जी को छोड़कर महलों के सुख कैसे ले सकती थी।
इसलिए सीता और लक्ष्मण दोनों महलों के सुख को छोड़कर जंगल में श्री राम के साथ एक साधारण जीवन जीने के लिए निकल पड़े।
स्वर्ण मृग का मायाजाल और सीता हरण की शुरुआत
वनवास के दौरान कहीं घटनाएं हुई लेकिन सबसे बड़ी और श्री राम की जीवन को बदल कर रखने वाली थी।
रावण की बहन शूर्पणखा का अपमान हुआ जिसके कारण रावण ने बदला लेने के लिए मारिच की सहायता लेते हुए एक स्वर्ण हिरन का रूप धारण करवाया ।
जब श्रीराम जी और सीता माता दोनों वन में बैठे हुए थे तब माता सीता को वह स्वर्ण हिरण पसंद आता है तब उस हिरण को लाने श्री राम जी निकल पड़ते हैं I

तब माता-सिता को अकेला कैसे छोड़ कर जाए इस वजह से लक्ष्मण जी सीता माता के लिए लक्ष्मण रेखा बना देते हैं ताकि माता-सीता सुरक्षित रहे।
उस वक्त साधु वेश में रावण माता सीता का अपहरण कर उन्हें लंका ले जाता है।
हनुमान और राम का दिव्य संगम
वनवास के दौरान धर्म का अंत करने के लिए श्री राम जी ने केवल एक ही लक्ष्य पर लक्ष्य केंद्रित किया था।
और किसी भी हाल में माता सीता को वापस लाना था सीता माता की खोज के लिए जब श्री राम जी निकल पड़े तब उनकी मुलाकात हनुमान और सुग्रीव से हुई।

हनुमान ने अपनी भक्ति शक्ति और बुद्धि से श्री राम का साथ दिया उन्होंने समुद्र पार करके लंका में प्रवेश किया सीता को ढूंढा राम का संदेश दिया और रावण को चेतावनी भी दे दी।
इसके बाद राम ने वाला सेवा के साथ मिलकर समुद्र पर एक श्री राम सेतु का निर्माण किया और लंका पर आक्रमण किया युद्ध बहुत भयंकर था रावण के भाई कुंभ करना पुत्र मेघनाथ जैसे शक्तिशाली योद्धाओं का उसे युद्ध में वध किया गया अंत में राम और रावण के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।
अधर्म पर अंतिम प्रहार
लेकिन रावण अत्यंत शक्तिशाली था उसके प्राणों की आहुति लेना इतना आसान नहीं था हनुमान के सहायता के साथ रावण की वह रचना रचाकर श्री राम ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके रावण का वध किया।

यह वही क्षण था जिसके लिए प्रभु श्री राम का जन्म हुआ था।
और आखिर में अधर्म का अंत और धर्म की विजय हो ही गई।
अंत में रामनवमी केवल एक जन्मदिन नहीं है यह वह क्षण है जिस अधर्म को मिट्टी में मिलाने के लिए प्रभु श्री राम जी के रूप में भगवान विष्णु ने जन्म लेकर यह सिद्ध किया कि जब-जब संसार में अधर्म बढ़ेगा तब तक धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर स्वयं अवतरित होंगे।
नियति का खेल: स्वर्ण मृग से रावण वध तक
सच मानो तो श्री राम को पता था कि वह स्वर्ण हिरण नहीं है वह एक धोखा है।
लेकिन फिर भी श्री राम वह हिरण को लाने नहीं जाते, तो रावण माता सीता का अपहरण न करता, अगर वह अपहरण न होता तो प्रभु श्री राम रावण का वध करने के लिए श्रीलंका नहीं जाते जबकि श्री राम जी का जन्म रावण का वध करने के लिए ही हुआ था।

प्रभु राम जानते थे कि स्वर्ण मृग एक छल है,
फिर भी उन्होंने उस मार्ग को चुना…
क्योंकि उसी मार्ग से होकर
अधर्म का अंत और धर्म की स्थापना होने वाली थी।
अगर सीता माता का हरण न होता,
तो रावण का अंत कैसे होता…?
और अगर रावण का अंत न होता,
तो प्रभु श्रीराम के अवतार का उद्देश्य कैसे पूरा होता…?
इसलिए हर घटना, हर मोड़, हर निर्णय
किसी न किसी बड़े उद्देश्य का हिस्सा था।
कभी-कभी जो हमें गलत लगता है,
वही आगे चलकर सबसे सही साबित होता है।
जो होता है, वो केवल संयोग नहीं…
वह ईश्वर की एक सोची-समझी योजना होती है।
जय श्री राम ।
